#49 राम
राम से निश्छल जय को पाना यौवन को तुम सदय बनाना
सधे हुओं का यौवन बनना जगजीतों का तुम मन बनना बनना आभा ललक किसी की होना आशा खनक किसी की प्रेम से करना सज्जित तन को जीवंत बनाना पुलकित बन को बनना वाणी मूक जनों की त्रास ना होना हूक मनों की कुम्हलाये फूलों को छूना फलदारों की तल रज छूना झुकना आगे हिमशिखरों के देवालय के पुण्य दरों के मनु के वक्षों से वक्ष मिलाना प्रिय जनों को लाड़ लड़ाना फल पहले प्रभु को अर्पण करना दिनकर को तकना तर्पण करना राम से निश्छल जय को पाना यौवन को तुम सदय बनाना अर्जुन से तुम रण में होना कान्हा सम कण कण में होना होना बजरंगी वीर ध्वजों का निज बनना तुम जगत तजों का यौवन पाने का मोद मानना गिरना पड़ना मुंह की खाना यूँ जीवन से आशीष मिलेगा कालजयी जगदीश मिलेगा जीवन उद्देश्य है नैतिकता में रामायण की अमर कथा में अमर कथा पर प्रश्नों वाले भीतर बैठे शंका पाले अनपढ़ दंभी लोभी होंगे वंचित होंगे जो भी होंगे प्रणय नीति का वो प्रणपाली जिसके सम सूर्य है आभाशाली जिससे तनमन को साहस मिलता नाम मात्र से यश रस खिलता समदृष्टा सम प्रीत विहार समज्ञानी सम पालनहार सह लछमण सीता-राम हैं प्रभु राम हैं प्रणाम है। , जो कालजयी है सब के मन में जिसका वर्चस्व ना एक भुवन में सब उस राजन से जाना मैंने देखा परखा माना मैंने समझो ना समझो बाध्य नहीं हो करता दृष्टा तुम साध्य नहीं हो - यौवन


