#51 ज़िया साहब की परछाई
रफ्तार और दीवानगी
मैंने चंद माह पहले अव्वल अफसानानिगारों की एक फेहरिस्त का जिक्र किया था, वही फेहरिस्त जिसमें मैं नहीं हूँ। फ़िलहाल उसमें मेरा होना भी नासाज़ है, पर आगे शायद मेरा शुमार हो। मुझे याद है उस दिन मैंने कोई उम्मीद न देते हुए इस इम्कान के सिलसिले में जोर नहीं दिया था की शुमार हो भी सकता है। खैर, ये सब बातें मजाज़ी (unreal) हैं, अभी इनका मानी ढूँढना ज़रा मुश्किल पेश आ सकता है।
सभी लोगों की तरह मेरी अभी तक की ज़िंदगी में, मोहब्बत बेशुमार और ऐसे किरदार जिनके जैसा होने के लिए उन्हे मौज़ू खयाल किया जाए, कुछ कम हैं। बेहतरीन बात ये है की इनमें से दो चार तो वो हैं जिनसे फ़ासले बहुत हैं, ये बेहतरीन बात इसलिए है क्योंकि मुझे उनके बारे में वही जानने को मिला है जिससे वो इस काबिल हो पाए, मेरी नज़र में ही सही।
एक शख्सियत जिन्हे मैंने एक आर्से से बड़ी बारीकी से सुना और देखा है, उनका नाम ज़िया मोहिउद्दीन है। मैं ज़िया साहब की ता’रीफ़ कमस्कम करने की कोशिश करूंगा क्योंकि ये मौज़ू मेरे मयार से बाहर है। मैं ज़िया साहब के त’अर्रुफ़ में महज़ इतना ही कहना चाहूँगा की मुझे वे इंशा जी से ज़ियादा दिल-पसंद हैं। जो मैं ये लिखता जा रहा हूँ, ज़िया साहब की आवाज़ में कही बहुत नज़्में मेरे ख्याल में आ रही हैं, ऐसी शोरीद नज़्में जिनको सुन कर संग-दिल भी एक बार को मोहब्बत कर बैठे। ऐसे बेजोड़, ऐसे लासानी अफ़साने जिन्होंने दिल में घर कर लिया है, चचा चक्कन जैसी कहानियों को आवाज़ दे कर, अफसानानिगारों को ला-फ़ानी कर दिया है। हम कभी खुल कर नहीं कहते पर, इक अफसानानिगार को सही आवाज़ मिलना अफ़साने में इज़ाफ़ा है। ज़िया सहाब ने ना जाने कितने अफसानों को आवाज़ के सहारे ज़िंदगी दी है। पढ़ने वाले आप, बहुत मुमकिन है उनके काम से नावाकिफ हों, पर ज़िया साहब अब आपकी दस्तरस में हैं। यूं तो मैं अग्रेज़ी शब्दों से कुछ परहेज़ करता हूँ पर इस सूरत में एक ऐसा अंग्रेजी शब्द मैं ज़िया साहब के सियाक़ (संदर्भ) में कहूँगा जो अंग्रेज़ी के लिए मुझे कुछ उम्मीद दे रहा है। ज़िया साहब का डिक्शन उनकी ता’लीम, तर्बियत, और उनकी मेहनत का सुबूत है। ज़िया साहब कहते थे डिक्शन क्लैरिटी ऑफ थॉट है। जिस उम्मीद की मैंने बात की, अँग्रेज़ी के लिए वो उम्मीद नन्ही है पर उम्मीद है, अंग्रेज़ी से अमूमन हमें यही शिकायत होती है की अंग्रेज़ी के एक ही लफ़्ज़ के बहुतेरे मानी हिन्दी, उर्दू में निकल आते हैं, पर ज़िया साहब की शान में अंग्रेज़ी भी दुरुस्त बैठती है। मेरी अँग्रेज़ी ज़िया साहब के मुक़ाबिल कुछ नही है, पर यहाँ भी नन्ही उम्मीद है। मैं यहाँ ज़िया साहब की सीरत-निगारी कर तो रहा हूँ पर उनकी ज़िंदगी के बारे में कुछ भी बताए बिना।
बीते समय में ज़िया साहब की आवाज़ बारहा मेरे जेहन में घूमती रही है, मेरे लिए ये पुर-असरार (weird) तजुर्बा नहीं है, पर आप पढ़ने वाले के लिए हो सकता है। हमारे यहीं कुछ दो चार घड़ी के साथ से, पढ़ने वाले आप के बारे में मुझे एक बात बखूबी समझ आ गई है। आप तजुर्बेदार हैं। ज़िया साहब भी तजुर्बेदार थे, वो अभिनेता, फ़िल्म निर्देशक, फ़िल्म निर्माता, टेलिविज़न शो होस्ट, व्यापारी, टेलिविज़न के लिए निर्माता, थिएटर निर्देशक, मंच अभिनेता और मुतकल्लिम (orator, dialectician) थे। ये सब उनकी कामयाबियों से बढ़कर उनकी तासीर का हिस्सा था। अगर मैं अपनी याद-दाश्त को खंगालूँ तो वो ज़िया साहब ही थे जिन्होंने मेरा त’अर्रुफ़ इंशा जी से करवाया, “शाम समय एक ऊंची सीढ़ियों वाले घर के आँगन में......” (नज़्म), ज़िया साहब की बदौलत मुझे ता’उम्र याद रहेगी और उनकी ही आवाज़ में सुनाई देती रहेगी। इंशा जी से मेरे त’अर्रुफ़ के कुछ ही समय बाद मैंने उनकी किताबें पढ़ीं और एक नज़्म फिर आज तक मेरे ज़ेहन में नक्श है, नज़्म है; ‘एक बार कहो तुम मेरी हो’।
देखा, पढ़ा? ज़िया साहब ये करते हैं एक मुसन्निफ़ (लेखक) के साथ, इसलिए एक मुतकल्लिम का होना या खुद मुतकल्लिम होना जरूरी है। खैर, ज़िया साहब जितनी साफ़ जुबान मैंने अभी तक नहीं सुनी है। कभी अब उन्हें बोलते सुनता हूँ तो उनकी ज़ाती नसीहत मुझे मुस्कुराने पर मजबूर कर देती है। ज़िया साहब के मानिंद मैं भी घिसे पिटे शेर दोहराने से परहेज करता हूँ, मैं तो शेर ही बहुत कम दोहराता हूँ। ज़िया साहब जैसे अपनी हथेलियों के बीच अपने चेहरे को टिकाए जॉन गीलगड को मोहब्बत से देखा करते थे, मैं ज़िया साहब को देखता हूँ। कुछ बरस पहले ज़िया साहब ने एक डाक्यूमेंट्री में अपनी पुर-मा’नी गुफ़्तगू को “desultory conversation” कहा था, मैं उनकी इस बात से इक़रार नहीं करता। अपनी तहरीर (लेख) के लिए मैं ज़िया साहब के वो अल्फ़ाज़ बड़े हक़ से चुराना चाहूँगा। मैं कौन हूँ? मैं ज़िया साहब की नौजवान परछाई हूँ।
खुशियां हम पे बहार बन के छाई रहें!


