#52 सीमित की अनुभूति
शम् करोति
परमात्मा एक ऐसा सार्थक और शाश्वत अनुभव है, जो हम इस शरीर रूपी यंत्र से पहचान सकते हैं। ये हमें कठिन इसलिए मालूम होता है क्योंकि हमने अनेकों बाधाएँ निर्मित कर ली हैं जिनके कारण ये अनुभव हमारे लिए मूलतः दुर्गम मालूम हो रहा है। जो सब हम अपनी इच्छा और कार्यक्षमता के रूप में अनुभव कर रहे हैं वो सब बाधाएं हैं। ये सब बाधाएं ऐसे हैं कि हम अपने स्वभाव को समझने में सक्षम नहीं हैं। हमारा स्वभाव ही परमात्मा का स्वभाव है, हमारी वृत्ति, धारणा, अवधारणा, ध्यान, अवधान, विचार, विमर्श, सब परमात्मा का है क्योंकि इसके अतिरिक्त कुछ संभव ही नहीं है। हम असीम का साक्षात्कार कर सकते हैं, हम असीम को सीमित रूप से अनुभव करते ही रह सकते हैं, परंतु उसे पूर्णतः नहीं जान सकते, या तो हमें समय बाध्य करेगा या हमारी वृत्ति। असीम को जानना ऐसा है कि एक बहुत बड़े शिवलिंग की परिक्रमा करना। अब इस शिवलिंग की अवधारणा हमारी सीमित चेतना से उत्पन्न हुई इसलिए ये शिवलिंग सीमित है, परंतु यदि हम शिवलिंग की परिक्रमा उसे हाथ लगा कर करें तो एक कभी ना खत्म होने वाले शिवलिंग की प्रतीति हमें अलग ढंग से होगी। सीमित से हम असीम का अनुभव नहीं कर सकते। हम यदि खोज को निकलें तो भ्रमित होंगे, जो खोया नहीं उसकी क्या खोज? यदि प्रश्न आए, की परमात्मा की अनुभूति इस शरीर रूपी सीमित यंत्र से सीमित ही होगी, तो इसका एक उत्तर यह होगा की, प्रथम, शरीर रूपी यंत्र को मात्र इन्द्रियों की युक्ति ना मानें, हमारा ये यंत्र, मात्र इन्द्रियों के पार भी अनेकों संभावनाएं लिए है। इन सब संभावनाओं को समझने के लिए इन्द्रियों से शुरू करना होगा। हमारी आसानी के लिए हम बहुत सूक्ष्म से शुरुआत कर सकते हैं। ध्यान विधियों द्वारा अपने शरीर को जानना - ध्यान विधियों द्वारा अपनी चेतना को जानना - जो अनुभव घटित होंगे उनको विसर्जित करना, उनसे बँधे ना रहना - अद्वैत के विषय में जानना - परमात्मा के संदर्भ में अनुभवों को समझना - भ्रांतियों द्वारा दिशाहीन होने पर पुनः अवधान का सहारा लेना।
शम्भो!


