#53 अमेरिका का मस्त योगी वाल्ट व्हिटमैन
कोई भी हो, तुम सारी दुनिया के सामने मेरे हो।
अमेरिका के लम्बे-लम्बे हरे देवदारों के घने बन में वह कौन फिर रहा है? कभी यहाँ टहलता है कभी वहाँ गाता है।
एक, लम्बा, ऊंचा, वृद्ध युवक, मिट्टी गारे से लिप्त, मोटे वस्त्र का पतलून और कोट पहने, नंगे सिर, नंगे पाँव और नंगे ही दिल अपनी तिनकों की टोपी मस्ती में उछालता, झूमता जा रहा है। मौज आती है तो घास पर लेट जाता है। कभी नाचता, कभी चीखता और कभी भागता है। मार्ग में पशुओं को हरे तृण का भोज उड़ाते देख आनंद में मगन हो जाता है। आकाशगामी पक्षियों के उड़ान को देख हर्ष में प्रफुल्लित हो जाता है। जब कभी उसे परोपकार की सूझती है तब वह गोल-गोल श्वेत शिव-शंकारों को उठा-उठाकर नदी की तरंगों पर बरसाता है। आज इस वृक्ष के नीचे विश्राम करता है, कल उसके नीचे बैठता है। जीवन के अरण्य में वह धूप और छाँह की तरह विचरता चला जाता है और कभी चलते-चलते अकस्मात ठहर जाता है, मानो कोई बात याद आ गई। बार बार गार्डन फेर ऊसर नेत्र उठा-उठा कर वह सूर्य को ताकत है। सूर्य की सुनहली सोहनी रौशनी पर वह मरता है। समीर की मंद-मंद गति के साथ वह नृत्य करता है, मानो सहस्त्रों वीणाएं और सितार उसके पवन के प्रवाह में सुनाई देते हैं। इस प्राकृतिक राग की आंधी के सामने, मानुषिक राग, दिनकर के प्रकाश में टिमटिमाती हुई दीप-शिखा के समान तेजहीन प्रतीत होते हैं। उसके भीतर बाहर कुछ ऐसी असाधारण मधुरता भरी है कि चंचरीक (भँवरा) के समूह के समूह उसके साथ-साथ लगे फिरते हैं। उसके हृदय का सहस्त्रदल ब्रह्म-कमल ऐसा खिला है कि सूर्य और चंद्र भ्रमरवत् उस विकसित कमल के मधु का स्वाद लेने को जाते हैं। बारी बारी से वे उसमें मस्त होकर बन्द होते हैं और प्रकाश पाकर पुनः बाहर आते हैं।
उस सुंदर धवलकेशधारी वृद्ध के वेश में कहीं न्यागरा की दूधधार तो नहीं फिर रही है? यह मस्त वनदेव कौन है। चलता इस लटक से है मानो यही इस वन का राजा या गंधर्व है। पत्ता-पत्ता, कली-कली, डाली-डाली, तने-तने को यह ऐसी रहस्यपूर्ण दृष्टि से देखता है मानों सब इसी के दिलदार और यार हैं। सामने से वे दो कृषक महिलायें दूध की ठिलियाँ उठाए गाती हुई आती हैं। क्या ही अलौकिक दृश्य है। औरों को तो ये दो आबलाएं अस्थि और मानस की पुतलियाँ ही प्रतीत होती हैं, परंतु हमारे मस्तराम की आश्चर्यभरी आँखों को वे केवल बांस की पोरियाँ ही दीखती हैं। उसकी निगूढ़ दृष्टि उनसे लड़ी। वे दोनों इस वृद्ध युवक को यायावर समझ कुछ खफा हुई, कुछ शरमाई और कुछ मुस्काई। उसने उनके मतलब को जान लिया। वह हंसा, खिलखिलाया और सलाम किया। नयनों से कुछ इशारे किए, आँसू बहाए। किसी की प्रशांशा की, कोई याद आया, किसी से हाथ मिलाया और उसे दिल दे दिया। यह दृश्य हमारे मस्त कवि का एक काव्य हुआ।
वे दो खोखले वृक्ष वेश बदलकर और वृद्ध स्त्रियों का रूप बनाकर सामने नज़र आए। वे दोनों वृद्धायें हाथ में हाथ मिलाए कुछ अलापती जा रही हैं। उसने जिन दो पूर्व युवतियों, हुस्न की पारियों, विकसित कलियों, को देखकर अपना काव्य-प्रवाह बहाया था उसी पवित्र काव्य-गंगा को वरक्षों के चरणों में भी छोड़ दिया। वह सौन्दर्य का कितना बड़ा पुजारी है। वह हर वस्तु में सुंदरता ही देखता है। क्यों नहीं, तत्ववित है न। उसके अनुभव में आया है कि उसकी एक मात्र प्यारी नाना रूपों में प्रत्यक्ष हुई है। प्रत्येक वस्तु सुंदर है – क्या बांस की लंबी-लंबी पोरियाँ और क्या वट के खोखले तने। या तो संसार की दृष्टि ही अपूर्ण है, या मेरी ही दृष्टि मदमाती है। उनमें अंतर अवश्य है जो आँख में अपने ही प्यारे को देखती है वह भला तुम्हारी कला में पैगामों के कारागार में कैसे बन्द हो सकती है। बस सौन्दर्य का सच्चा पुजारी यही है। यह सब को सदा यही सुनाता है – “तुम भले, तुम भले”
अमेरिका के वन में नहीं, जीवन के अरण्य में यह कौन जा रहा है? यह प्रकृति का बम्भोला है कौन? यह इतना शरीफ अमीर होकर ऐसा रिंद फकीर है कौन? अमेरिका के वही मूर्ख, तत्वहीन, मशीन-रूपी नरक में यह जीता जागता ब्रह्मज्ञानरूपी स्वर्ग कौन है? उसकी उपस्थिति मात्र से मनुष्य की आभ्यंतरिक अवस्था बदल जाती है। अमेरिका की बहिर्मुख सभ्यता को लात मारकर बिरादरी और बादशाह से बागी हो कर, कालीनों को जलाकर, महलों में आग लगाकर यह कौन जाड़ा मना रहा है? प्रभात की फेरीवाला, जंगल का जोगी, अमेरिका का स्वतंत्र और मस्त फकीर वाल्ट व्हीटमैन अपनी काव्यरचना करता हुआ जा रहा है।
वह कोमल और ऊंचे, लम्बे और गहरे, स्वरों में एक सन्देसा देता जा रहा है। सभ्यता के नगरों से यह जोगी जितनी ही दूर होता जाता है उसका स्वर उतना ही गंभीर होता जाता है।
वास्तव में मनुष्य स्वतंत्रताप्रिय है। किसी प्रकार के दासपन को वह नहीं सह सकता। आजकल अमेरिका में लोग अमीरों से तंग आ गए हैं। वहाँ घर और वस्त्रों को कफन और कब्र बनाकर मनुष्य-जीवन का प्रवाह दबाया जाता है। चमकता हुआ कलदार ही इस बाह्य जीवन को स्थित रखने का वहाँ खुदा है। जैसे भारतवासी फोटो उतरवाते समय होंठों और मूछों के कोण और कोटों के किनारे संभालते हैं उसी तरह आधुनिक कलदार सभ्यता (dollar-civilisation) में जीते जागते मनुष्यों को सुंदर फोटो रूप बनकर अपना जीवन व्यतीत करना पड़ता है। उनके आचरण हृदय-प्रेम की ताल में तुले नहीं होते, वे कृत्रिम होते हैं। वहाँ काव्य के नृसिंह भगवान व्हिटमैन ने अपने उच्चनाद से हिंदुओं की ब्रह्मविद्या और ईरान की सूफी विद्या को एक ही साथ घोषित किया है। वाल्ट व्हीटमैन के मत में वह मनुष्य ही क्या जो ब्रह्मनिष्ठ नहीं। वह एक मनुष्य के जीवन में मनुष्य-मात्र का जीवन और मनुष्य-मात्र के जीवन में एक मनुष्य का जीवन देखता है। उसके काव्य का प्रवाह आकाशवत् सार्वभौम है। जैसे आकाश समस्त नक्षत्र आदि को उठाए हुए है उसी तरह उसका काव्य सब चर और अचर, नर और नारी को, चमकते-दमकते तारों की तरह, अपने में लपेटे हुए है। वह सब के मन की बात कहता है और सब उसको अपने मन की बात बताते हैं। गरीबों को अमीर और अमीरों को गरीब करने वाला कवि यही है। अपने आनन्द की मस्ती में उसे काव्य की तुकबन्दी भी बंधन प्रतीत होती है। वह प्रत्येक दोहे-चौपाई को पिंगल के नियम की तराजू में नहीं, किन्तु अपने हृदयानन्द से तोलता है। जो लोग मिस्र के पिरामिड को उत्तम कला-कौशल का नमूना मानते हैं उनकी सुंदरता की दृष्टि पर्दानशीनों की सी है। प्रकृति के बाह्य अनियमित दृश्य इन पर्दानशीनों के नियमित दृश्यों से कहीं बढ़-चढ़कर है। जो भेद समुद्र की छाती के उभार के प्रेमियों और एक युवती के वक्षस्थल के उभार के प्रेमियों में है वही भेद व्हीटमैन सदृश स्वतंत्र काव्यप्रेमियों और तुकबंदियों के प्रेमियों में है। बाग बनाना तो मानुषी कला है, और जंगल बनाना दिव्य कला है। और मुर्दा प्रकृति को जीवित संसार बना देना ब्रह्मकला है। और कवि तो केवल चित्र बनाते हैं, परंतु यह कवि जीते-जागते प्राणियों को अपने काव्य में भरता है। नीचे वाल्ट की पोएम्स ऑफ जॉय (poems of joy) नामक कविता के कुछ खंडों का तर्जुमा है:
ओ:! कैसे रचूँ आनंदभरी, रसभरी, दिलभरी कविता। राग भरी, पुंसतवभरी, स्त्रीत्व भरी, बलकत्व भरी, संसार भरी, अन्न भरी, पहल भरी, पुष्प भरी। ओ:! पशुओं की ध्वनि लाऊं, मछलियों की फुर्ती, और उनके, तुले हुए तैरते शरीरों को लाऊं। चारों ओर हो विशाल समुद्र का जल, खुले समुद्र पर हों खुले बादबौ, और खुले हमारी नैया। ओ:! आत्मानंद का दरिया टूटा, पिंजड़े टूटे, दीवारें टूटीं, घर बह गए और शहर बह गए। इस एक छोटी सी पृथ्वी से क्या होता है? लाओ, दे दो सब नक्षत्र मुझे, सब सूर्य मुझे और सब काल मुझे। ओ: इस अनादि भौतिक हृदय पीड़ा को – इस प्रेम दर्द को दरसाऊँ कैसे अपनी कविता में। कैसे बताऊँ उस आतंगङ्गा के नीर को; कैसे बहाऊँ प्रेमाश्रुओं को अपनी कविता में। जो पृथ्वी है सो हम है; जो तारे है सो हम है; ओ हो! कितनी देर हमने उल्लुओं के स्वर्ग में काट दी। हम शिला हैं, पृथ्वी में धसे हैं; हम खुले हैं, साथ-साथ पड़े है, हम हैं दो समुद्र, जो आन मिले हैं। पुरुष का शरीर पवित्र है, स्त्री का शरीर पवित्र है, फूलों का शरीर पवित्र है, वायु का शरीर पवित्र है, जल पवित्र है, धरती पवित्र है, आकाश पवित्र है, गोबर और तृण की झोपड़ी पवित्र है, प्रेम पवित्र है, सेवा पवित्र है, अर्पण पवित्र है। लो अब अपने को तुम्हारे हवाले करता हूँ। कोई भी हो, तुम सारी दुनिया के सामने मेरे हो।


