#54 गीता-विज्ञान
य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम्। उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते।।
य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम्। उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते।। २-१९
सामान्यार्थ (और) जो आत्माको मारनेवाला समझता है तथा जो उसको मरा हुआ मानता है, वे दोनों ही नहीं जानते, क्योंकि यह आत्मा न मरती है और न मारी जाती है।
विशेष पिछले श्लोकमें श्रीकृष्णजी अर्जुनसे यह कह चुके हैं कि आत्मा अविनाशी है और उसके सारे शरीर स्थूल, कारण और सूक्ष्म नाशवान हैं, यह जानकर तू कर्म करने में प्रवृत्त हो। प्रस्तुत श्लोक में उसके संशय को दूर करने के लिये कह रहे हैं कि तू यदि यह समझता है कि तू (आत्मा) किसी को मारता है अथवा तुझे (आत्मा) कोई मारता है तो तेरी यह भूल है क्योंकि जो कुछ भी इस दृश्यमान जगत में नाम रूप से भला बुरा विद्यमान है वह सब कुछ उसी एक परात् परब्रह्म का ही अंग है अथवा कार्य है, उसकी सहचरी माया के बहकावे में आकर जीव के मनमें भ्रम उत्पन्न होता है और वह अपने आत्मस्वरूप को न जानने के कारण अपने को (आत्मा) नाशवान समझकर अन्यान्य चिन्ताओं और व्यधाओं से ग्रसित होता हुआ अपने को दुःखी जानकर अनेक प्रकार से पश्चाताप किया करता है। उसी स्थित्तिमें अर्जुन कृष्ण भगवान के सामने खडा है। (आजके सांसारिक लोग भी अर्जुन कीसी स्थितिमें अपने जीवनको चला रहे हैं, उन्हें कार्यरत होना तो आता नहीं किन्तु वे अपनी लाज बचाने के लिए अनेक प्रकार के तर्क-वितर्क का सहारा लिया करते हैं। अतः मानव मात्र को गीता के जैसे तथ्यपूर्ण उपदेशों को अपने व्यवहार में लानेके लिये प्रयत्नशील होना चाहिये।) उसको यह अहंकार व्याप्त किये हुए है कि वही प्रत्येक कार्य का कर्ता-धर्ता है। तथा वह जो कुछ करता है उसका प्रतिफल उसे ही मिलेगा।
संसार में दो प्रकार के कार्य होते हैं, एक अपने वर्णानुसार कार्य दूसरा उससे विपरीत जो कार्य अपने वर्णानुसार किया जाता है उसका फल व्यक्ति को नहीं मिलता क्योंकि यह तो उसका निश्चित कर्म ही होता है, दूसरा कार्य जो अपने वर्णाश्रम धर्मके विपरीत किया जाना है उसका फल औचित्य और अनौचित्यकी दृष्टि से व्यक्ति को अवश्य ही मिला करता है यहाँ पर अर्जुन क्षात्रवर्णका है और उसका कर्तव्य निश्चित है कि वह सामने आई हुई आपत्ति से जूझकर सफल हो या अपने प्राणों को न्यौछावर कर दे। तभी वह अपने क्षात्र धर्मको पूरा कर यश का भागी हो सकेगा, अर्जुन अपने धर्म (कर्तव्य) से इन्कार कर अहिंसा का अनुसरण करने जा रहा है। यह उसके लिये उचित नहीं। इसी अनौचित्य को अर्जुन को समझाने के लिये गीता के उपदेश का प्रादुर्भाव हुआ है और प्रस्तुत श्लोक में उसे कहा जा रहा है कि वास्तविकता यह है कि आत्मा तो साक्षीका कार्य करता है, वह सदा एक रस रहता है, वह नित्य है उसका कभी न नाश होता है उसका न कभी जन्मा होता है और न मरण ही। फिर जो इस प्रकार का अजन्मा आदि स्वरूप है उसे कौन मार सकत है? जगत में एक ही ब्राह्म की सत्ता व्याप्त है उसके सभी अंशमात्र हैं फिर अपने अंशको कौन मारना चाहता है? सभी उसी एक ब्रह्म में प्रतिष्ठित हैं ठीक उसी प्रकार जैसे हमारे शरीरमें हमारे हाथ, पाँव आदि जुड़े हुए हैं। हम कभी यह नहीं चाहते कि हम अपना हाथ काट देवें या पैर, बल्कि हम यही विचार किया करते हैं कि उन्हें किसी प्रकार से चोट न लगे और वे सदा सुरक्षित रहकर हमारी (आत्मा) की सेवा (पूजा) करते रहें। उपर्युक्त विवरण से यह स्पष्ट हो चुका कि आत्मा के अजर, अमर रहनेसे हमारा यह कहना विल्कुल निरर्थक है कि हम किसी को मारते हैं अथवा कोई हमें मारता है। हम (आत्मा) तो अजर अमर और सनातन हैं।
हरि बोल!


