#55 अजनबी-म्यूरसो-कामू
चीज़ों का सामना बिना किसी भ्रम या अर्थ के करना चाहिए।
अल्बर्ट कामू की किताब, अजनबी (द स्ट्रेंजर) के मुख्य किरदार म्यूरसो को जब पहले-पहल मैंने उदासीन और भावनाओं से परे जाना, तब बहुत मुमकिन है मुझसे गलतियाँ हुईं। मैंने म्यूरसो को समाज से अलग और सामाजिक तौर पर साधारण लोगों से कुछ कम समझदार जाना। म्यूरसो का किरदार इतनी साधारणता से असाधारण था कि उसके और समाज के बीच की दूरियाँ कहानी से बाहर भी नज़र आने लगी थीं। म्यूरसो का हर हाल में बेकसूर होना इसी बात से तय था कि, जब भी कभी म्यूरसो के हक़ में सफाई की गुंजाईश होती तो मैं खुद उसकी पैरवी करने कहानी में उतर जाता, कामू ने भी कहानी में ये ही किया। म्यूरसो को एक सामान्य व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत करने के प्रयास में कामू ने बहुत हद तक वो बयान किया जो कहानी का हर किरदार महसूस कर रहा था।
यहीं से मुझे म्यूरसो को दोबारा देखने की ज़रूरत महसूस हुई, उदासीनता के चश्मे से नहीं, बल्कि विसंगति (Absurd) की रोशनी में। म्यूरसो भावनाहीन नहीं था, वह उन भावनाओं का दिखावा नहीं करता था जिन्हें समाज सुरक्षित और स्वीकार्य मानता है। उसका प्रेम शब्दों और प्रतिक्रियाओं में नहीं, बल्कि दृष्टि में था। जैसे जब हम किसी प्रिय वस्तु को देखते हैं तो अनायास ही हमारी आँखों की पुतलियाँ बड़ी हो जाती हैं, वैसे ही ना जाने उस अरब को मारने से पहले म्यूरसो ने कितने सूराजों की रौशनी को देखा था। म्यूरसो की पुतलियों का तपती धूप में इतना बड़ा हो जाना कि उसे रौशनी असहनीय महसूस हो, म्यूरसो के प्रेम प्रमाण है। म्यूरसो का ये प्रेम और ये अनुभव ही एकमात्र ऐसा कारण है जिस से म्यूरसो को असाधारण प्रस्तुत किया जा सकता है। बिना किसी घोषणा के, बिना किसी शोर के, वैसे ही म्यूरसो की आँखों में दुनिया के लिए एक मौन चमक थी। सूरज, समुद्र, नमक-भरी हवा, सिगरेट का स्वाद, पानी में तैरते शरीर का भार, इन सबके सामने उसकी चेतना फैल जाती थी, जैसे पुतलियाँ फैल जाती हैं।
म्यूरसो दुनिया से प्रेम करता था, लेकिन उस प्रेम को छिपे हुए रास्तों से जीता था, उन रास्तों से, जिन पर हम चलने से कतराते हैं। मैरी के साथ उसका रिश्ता किसी महान भविष्य की योजना नहीं बनाता, फिर भी वह उसके साथ हँसता है, तैरता है, उसकी उपस्थिति में सहज रहता है। यही उसका प्रेम था, न वादों से भरा, न भय से। माँ की मृत्यु पर उसका मौन भी इसी प्रेम का हिस्सा था। वह शोक का नाटक नहीं करता, क्योंकि उसे मृत्यु से झूठा सौदा मंज़ूर नहीं। वह जीवन को उतनी ही सच्चाई से स्वीकार करता है, जितनी सच्चाई से वह उसके अंत को स्वीकार कर सकता है।
विसंगति में यही प्रेम सबसे ईमानदार है, दुनिया को अर्थों से भरने की ज़िद के बिना उससे जुड़ जाना। म्यूरसो सूरज से परेशान होता है, उसकी रोशनी से थकता है, फिर भी उसी रोशनी में जीता है। जिस दिन वही सूरज उसे समुद्र तट पर अपराध की ओर धकेलता है, उसी दिन वह यह भी उजागर कर देता है कि म्यूरसो का अपराध जीवन से नफ़रत नहीं, बल्कि जीवन के प्रति उसकी अत्यधिक जागरूकता है। दुनिया उसे इतनी गतिमान लगती है कि वह उसे सहने की कोशिश करता है।
हम प्रेम को बड़े शब्दों, आँसुओं और घोषणाओं में छिपाते हैं। म्यूरसो प्रेम को सामान्य में जीता है, गरम दोपहर में, कॉफी के कप में, सिगरेट की राख में, समुद्र के नमकीन पानी में या साधारणतः दो गोलियों के अंतराल में।


