#56 तीस-दिसम्बर
२३वी सालगिरह
हर बरस ये समय दो बहानों से बीते समय की स्मृतियाँ ले आता है, पहला बहाना ये की मेरी सालगिरह होती है और दूजा ये की बरस ख़त्म होने को होता है। स्मृतियों में सर्वप्रथम महज़ एक वाक़िया, ख्याल या विचार नहीं है, परंतु एक भाव है, बड़ा प्रबल भाव। बीते बरस मैंने लेखन के संदर्भ में अपने आप को अति-असहाय जाना, शुरुआती कुछ माह ऐसे हुए की कुछ मिला और बहुत कुछ जीवन से जाता रहा। मैंने कोशिशें तो बहुत की कि अलग-अलग ज़रिए तलाश किए जाएँ जिनसे मन शांत हो, लेकिन ये सब अलग-अलग ज़रिए किताबों पर ही आ पहुँचे। मुझे स्मरण है की लगभग दो माह मेरी दिनचर्या कुछ अटपटी और अजीब बनी रही। मेरे दिन की शुरुआत सवेरे सात-आठ बजे नाश्ते के बाद की नींद से होती थी। तीन-चार घंटे सो लेने बाद मैं उठता और सिरहाने रखी दस-पंद्रह किताबों में किसी एक को खोल, लेटे-लेटे पढ़ता रहता। इसी दौरान नींद के अभाव को भी मैंने जाना, ख़ैर इसी सिलसिले में जब हाथ में पकड़ी किताब से मन ऊबने लगता तो अपने बिस्तर से एक हाथ की दूरी पर रखी अपनी मेज़ पर जा बैठता। मेज़ पर एक बार बैठ जाने के बाद, अपने बीच में छोड़े हुए अनुवाद टटोलना, जिस किताब का अनुवाद है उस किताब को दोबारा-तिबारा पढ़ना और इसी में ही शाम कर देना। शाम को स्नान कर, कुछ देर बाहर घूम कर रात्रि ११ बजे तक घर आ जाना मेरी नई आदतों में से एक हो चली थी। रात्रि में अपनी मेज़ और कुर्सी पर बैठे-बैठे किताबें खंगालना और लिखने का प्रयास करना भी आदत बन चला था।यही सब सवेरे छह-सात बजे तक चलता।
मैंने आख़िरी ग़ज़ल या लेख ग़ालिबान उसी दौरान लिखा था, इस दौरान जो लिखा वो सब या तो अनुवादित था या उस सब में स्तरीयता का अभाव था। हौले-हौले ऐसे मुझे लगने लगा कि बहुत मुमकिन है ये कविताएँ लिखने का सिलसिला बस यहीं तक हो। अनेक प्रयासों के बाद मैं असहाय और हताश हो इस बात से सब्र कर बैठ गया कि अब और लिखना हो ही नहीं पाएगा। जिस दौरान ये सब विचार हुए उस दौरान लेखन का कार्य न्यून हुआ। दो माह की इस दिनचर्या के बाद कुछ बदलाव आएं जिनके कारण और पैमानों पर चीज़ें बदली। अभी कुछ दिन पहले ही एक गीत हुआ।
मेरे मन के मंदिर में जो कलिका बैठी गाती थी मेरे नयनों में वो दिखती हँसती थी मुस्काती थी उसकी अश्रुधार से मेरा यौवन धुलता जाता था जिसकी ख़ातिर ही लिखता जिसको गीतों में गाता था जिसकी ख़ातिर ही लिखता जिसको गीतों में पाता था जिसके रंग बदल जाने से यौवन भी कुम्हला जाये स्वप्न सरीखी वो लड़की अब तो वसुधा पर आ जाये जिसकी एक झलक को मैं दिनमान अकेला बैठा हूँ अपनी एक ललक को मैं ज़िद जान अकेला बैठा हूँ अपनी एक ललक को मैं ज़िद जान अकेला बैठा हूँ बढ़ते-बढ़ते प्रेम से जब भी हो जाये असहाय सदय विशख बाण से रंजित हो कर जब गाता हो हाय हृदय जब लाली ही विशख बाण पर लगी हलाहल बैठी हो जब एकांकी जीवन में दिनमान ही हलचल रहती हो जब एकांकी जीवन में दिनमान ही हलचल रहती हो अभी सुधा का प्रथम स्पर्श है पान अभी भी बाक़ी है और पीयूष से जीवन का संधान अभी भी बाक़ी है जिसके आने से मन-तन मेरा अमर मठों सा हो जाये जिसके मंथन से प्रेम बने अठखेल हठों सा हो जाये जिसके मंथन से प्रेम बहे अठखेल हठों सा हो जाये अपनी खातिर जिसका सुमिरन मैंने बहुत किया लोगों अपने जी का जोड़ के सब कुछ उसको बहुत दिया लोगों जो कलिका अब इक मूरत के चरणों में बिछ जाती है मेरे गीतों को गाती है मुझको गीतों में पाती है मेरे गीतों को गाती है मुझको गीतों में पाती है -यौवन



I love the way you write ….. it is a very beautiful read!! Keep writing🤍