#47 मेघदूत में विज्ञान
कालिदास सच सच बतलाना
यह वैज्ञानिक युग है। यहाँ विज्ञान की महत्ता का वर्णन करना अनावश्यक है। क्योंकि आजकल चारों ओर उसी की चर्चा है; सर्वत्र उसके कौशल दिखाई पड़ते हैं। हमारे भारतवर्ष में कभी विज्ञान की चर्चा थी या नहीं, इसका निर्णय करना कठिन है। आर्यसमाजियों ने वेदों से कई वैज्ञानिक बातें ढूंढ़ निकाली हैं। पण्डित भीमसेन शर्मा ने भी अपने लेखों द्वारा वैदिक काल की कई वैज्ञानिक बातें सुनाई हैं। पर उनकी बातों पर लोगों का ध्यान नहीं गया और विश्वास नहीं कर पाए। लोग कहते हैं कि यदि वेद में विज्ञान है तो पाश्चात्य विज्ञान का प्रसार होने के पहले इन लोगों ने वेदों से विज्ञान की प्राचीनता क्यों न सिद्ध की? मैं दिखलाना चाहता हूँ कि मेघदूत ऐसे छोटे ग्रन्थ में भी अनेक वैज्ञानिक बातें हैं। मैं यह नहीं कहता कि जैसे सिद्धान्त पहले थे वैसे ही आज भी हैं और प्राचीन तथा नवीन प्रक्रियाएँ एक सी हैं। तो भी मैं इतना अवश्य कहूँगा कि विज्ञान की बातों को प्राचीनों ने पौराणिक रूप दे दिया है, पर उनमें वैज्ञानिक तथ्य अवश्य है।
मेघदूत के पाँचवें श्लोक में लिखा है "धूमज्योतिः सलिलमरुतां सन्निपातः क्व मेघः” इस पद में मेघ बनने की प्रक्रिया है। अर्थात् मेघ धुआँ, तेज, जल और हवा के संयोग से बनता है। कैसे बनता है, इसके विशेष विवरण की यहाँ आवश्यकता नहीं। महाकवि की इस बात को आधुनिक वैज्ञानिक भी मानते हैं। सम्भव है कि वे इसे सर्वांश में न मानें, किन्तु अधिकांश में इससे अवश्य सहमत होंगे। हमारे प्राचीन ग्रन्थों में भी इसका वर्णन है। पहले अधिकाधिक यज्ञ होते रहने से समय समय पर वृष्टि (वर्षा) अधिकता से होती थी। प्राचीन पुरुष यज्ञाभाव को वृष्ट्यभाव का कारण बतलाते हैं। मेघ के बनने में याज्ञिक घूम अर्थात् पवित्र पदार्थों का धुआँ मेघ का साधक और विकृत पदार्थों का धुवाँ मेघ का बाधक है।
"विकृत पदार्थ" का अर्थ है ऐसा पदार्थ जिसका घनत्व (density) इतना अधिक हो कि उसके दाब (pressure) का अधिकांश भाग पाउली अपवर्जन सिद्धांत (Pauli exclusion principle) से उत्पन्न हो। पाउली का अपवर्जन का नियम क्वाण्टम यांत्रिकी का एक सिद्धान्त है जिसे सन् 1925 में वुल्फगांग पाउली ने प्रतिपादित किया था। (अपवर्जन का अर्थ होता है - छोड़ना, अलग नियम लागू होना, आदि।) "कोई भी दो समान फर्मिऑन (fermions), एक ही समय में, एक समान प्रमात्रा स्थिति (quantum state) में नहीं रह सकते।" फ़र्मियन में प्रोटॉन, न्यूट्रॉन, इलेक्ट्रॉन, न्यूट्रिनो और क्वार्क शामिल हैं।
मेघदूतोक्त बात की पुष्टि के लिए उपनिषदों और पुराणों के कुछ प्रमाण उद्धृत किये जाते हैं-
अग्नौ प्रास्ताहुतिः सम्यगादित्यं उपतिष्ठते । आदित्याज्जायते वृष्टिर्वृष्टेरन्नं ततः प्रजाः ।। अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः। यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः।।3.14।।
विवस्वानंशुभिस्तीक्ष्णैरादाय जगतो जलम्। सोमे मुंचत्यथेन्दुश्च वायुना धीमयैर्यदि।। नालैविंक्षिपते भ्रेषु धूमानलिनमूतिथु। न भ्रश्यन्ति यतस्तेभ्यो जलान्यभ्राणि तान्यतः।।
श्री गोस्वामी तुलसीदासजी भी कहते हैं-
धूम अनल संभव सुनु भाई। तेहि बुझाव घन पदवी पाई॥१॥ सोइ जल बनता-अनिल-संघाता। होई जलद जग-जीवनदाता ॥२॥
मेघदूत के पन्द्रहवें श्लोक में लिखा है "वल्मीकाग्रात् प्रभवति धनुःखण्डमाखण्डलस्य। अर्थात् वल्मीक से इन्द्र-धनुष का टुकड़ा उत्पन्न हो रहा है। इन्द्रधनुष सूर्य की किरणों के कारण बनता है। जब सूर्य पश्चिम में रहता है तब वह पूर्व की ओर उत्पन होता है और जब सूर्य पूर्व की ओर होता है तब वह पश्चिम की ओर दिखाई पड़ता है। यह तिरछी किरणों की प्रतिच्छाया है। दोपहर को वह नहीं दिखाई पड़ सकता और न बिना बादल और वृष्टि के ही वह उदित हो सकता है। उसमें सात प्रकार के रंग होते हैं।
इस पूर्वोक्त श्लोक-खण्ड का वल्मीक शब्द सन्दिग्ध है। वल्मीक शब्द के कई अर्थ हैं। इन अर्थों के आधार पर कई टीकाकारों ने कई प्रकार की बातें कही हैं। शब्दार्णव में वल्मीक शब्द का अर्थ लिखा है- दीमक द्वारा बनाई बांबी याने मिट्टी के ढेर की चोटी। "बामलूरे गिरेः श्रृङ्गे वल्मीकपदमिष्यते।" अन्यान्य कोषों में लिखा है-"वल्मीकः सातपो मेघः। "वल्मीकः सूय्र्य इत्यपि।" श्री जगदीशकृत "शब्दशक्ति-प्रकाशिका" के अपादान-कारक प्रकरण में भी "वल्मीकः सातपो मेघः" लिखा है।
मल्लिनाथ बाँबी और आतपयुक्त मेघ से इन्द्रधनुष का होना लिखते हैं। सुबोधा और सारोद्धारिणी टीका में लिखा है- "इन्द्रचापं किल वल्मीकान्तर्व्यवस्थितमहानाग् शिरोमणिकिरणसमूहात्समुत्पद्यते।" वल्लभ, सनातन, रामनाथ, भरत, हरगोविंद, कल्याणमल्ल और अन्यान्य टीकाकार 'वल्मीकाग्रात्' का 'रामगिरिशृंगात' अर्थ करते हैं। रामनाम, वल्लभ आदि 'वल्मीकात्' का 'सूर्यात' भी अर्थ करते हैं। 'वल्मीकाग्रात्’ 'सातपमेघात्' यह अर्थ भी वल्लभ आदि टीकाकार लिखते हैं। 'बल्मीकः सातपो मेघ:' 'वल्मीकः सूर्य इत्यादि' इनका पता कोषों में नहीं लगता। पर इन अर्थों से वैज्ञानिकता में बाधा नहीं पड़ती। रामगिरि का शिखर मान लेने में भी कोई बाधा नहीं। क्योंकि दूर से देखनेवाले ऐसा अनुमान कर सकते हैं। उच्च होने के कारण बाँबी और टीले से भी यहां अनुमान हो सकता है। अन्यान्य अर्थ प्राचीनता से भरे है।
इन्द्रधनुष के विषय में वराहमिहिर कहते हैं-
सूर्यस्य विविधवर्णाः पवनेन विघट्टिताः कराः साभ्रे । वियति धनुःसंस्थाना ये दृश्यन्ते तदिन्द्रधनुः ।। ३५.०१ ।।
के चिदनन्तकुलौरगनिःश्वासौद्भूतं आहुराचार्याः । तद्यायिनां नृपाणां अभिमुखं अजयऽवहं भवति ।। ३५.०२ ।।
चौवनवे श्लोक में कालिदास लिखते हैं "तान् कुर्वीथास्तुमुलकरकावृष्टिपातावकीर्णान्" अर्थात् पहाड़ी मृग जब तुम्हें बाधा पहुंचायें तब उन्हें करका (ओले) बरसा कर तितर बितर कर देना। इसके पहले, एक श्लोक में, "तस्या एव प्रभवमचलं प्राप्य गौरं तुषारैः" अर्थात् जिससे गंगा पैदा हुई है उस हिमालय पर पहुँच कर........ इस वर्णन से विज्ञान की एक बड़ी मार्मिक बात निकलती है। यहाँ कालिदास ने कई श्लोकों में जल पीने और वृष्टि करने आदि का वर्णन किया है। परन्तु जब हिमालय की तराई में पहुंचते हैं तब जलवृष्टि न कराकर करका-वृष्टि कराते हैं। क्यों? वे समझते हैं कि चारों तरफ हिमालय की बर्फीली चोटियों से निकलते समय मेघ में तरल रूप से जल का रहना कभी सम्भव नहीं।
विज्ञान के सिद्धात्त्त से जल की तीन अवस्थायें होती हैं। जब शीत की अधिकता होती है तब जल बर्फ का आकार धारण करता है; जब उष्णता का संचार होता है तब तरलावस्था में जल दिखलाई पड़ता है; और जब जल में अधिक ताप पहुंचता है तब वह जल भाफ (बाष्प) बन जाता है। इस सिद्धान्त को दिखलाने में कालिदास ने किसी बात की त्रुटि नहीं की। मेघ पहले यथास्थान जल बरसाता आया है, पर हिमालय में शीत की अधिकता से जमे हुए जल को करका रूप से बरसाता है। जल-बिन्दुओं ने करका (Hail-stone) का आकार धारण किया है।
काले काले भवति भवतो यस्य संयोगमेत्य स्नेहव्यक्तिश्चिरविरहजं मुञ्चतो वाष्पमुष्णम्॥
इस से भी विज्ञान की एक बात निकलती है। इसमें 'भवति' मेघ के लिए और 'यस्य' रामगिरि के लिए आया है। इन दोनों के संयोग का वर्णन कालिदास ने बड़ी खूबी से किया है। यदि दो मित्र परस्पर कुछ समय के बाद मिलें तो करण-मिश्रित प्रेम के वशीभूत होकर उनके नेत्रों से आँसू चलना स्वाभाविक है। पर इस स्वाभाविक वर्णन के साथ विज्ञान का भी कुछ अंश है। पहाड़ चार महीने की गर्मी से बहुत उत्तप्त हो जाता है। उस पर यदि मेघ थोड़ा जल बरसा दे तो भाफ निकलने लगती है। उत्तप्त वस्तु पर शीत के संयोग से भाफ बनती है। जाड़े के दिनों में प्रातःकाल जो कुहरा देख पड़ता है वह इसी वैज्ञानिक सिद्धान्त का निदर्शन है। इस बात को कालिदास बड़ी उत्तमता से व्यक्त करते हैं:
विद्युद्धर्भः स्तिमितनयनां त्वत्सनाये गवाक्षे वक्तुं धीरः स्तनितवचनैर्मानिनीं प्रत्र्कमेथा:।।
इस पद्यार्थ का भावार्थ यह है कि जब तुम खिड़की पर जाकर बैठ जाओगे तब मेरी पत्नी टकटकी बांध तुम्हें देखने लगेगी। उस समय तुम अपनी प्यारी बिजली को गोद में छिपा कर मन्द-मन्द गर्जन रूपी वचनों से उस मानिनी से कहना प्रारम्भ करना।
यह सर्वसम्मत वैज्ञानिक सिद्धान्त है कि बादल में बिजली होती है। जब दो बादल एकत्र होते हैं तब उनमें विद्युत्संचार होता है। यदि किसी बादल में अधिक बिजली हुई तो वही दूसरे में चली जाती है। जब यह संचालन-प्रक्रिया होती है तभी गर्जन होता है। जब गर्जन होता है तब विद्युत्स्फुरण भी अवश्य होता है। ये दोनों काम साथ ही साथ होते हैं।
यक्ष यह सोचता है कि यदि मेघ अपने गर्जन-द्वारा बोलने का उपक्रम करेगा तो विद्युत्स्फुरण भी अवश्य ही होगा। इससे मेरी प्रिया की दृष्टि स्थिर होना सम्भव नहीं। जब उसकी दृष्टि स्थिर न रहेगी तब समाचार सुनने में वह दत्तचित्त नहीं हो सकती। अतः यक्ष पहले ही से मेघ को सावधान किये देता है कि भाई मेघ! तुम विद्युद्गर्भ हो जाना, अपने गर्जन के समय बिजली को अपने उदर में रोके रखना, छिपाये रहना। ऐसा न हो कि उस समय बिजली चमक जाय।
मेघदूत में ऐसी ही और भी वैज्ञानिक बातें हैं। ठंडी हवा से गूलर पकते हैं- "शीतो बातः परिणमयिता काननोदुम्बराणाम्।" तेज हवा मेघों को इधर उधर बिखेर देती है। इससे मन्द मन्द हवा ही उनके लिए उपयुक्त है-"मन्दं मन्दं नुदति पवनश्चानुकूलो यथा त्वाम्। मेघ में जल रहने से गुरुत्व और न रहने से लघुत्व आ जाता है- "तोयोत्सर्गद्रुततरगतिः- अन्तःसारं घन तुलयितु नानिलः शक्ष्यति त्वाम्।" इत्यादि बातों को देखने से कौन कह सकता है कि मेघदूत में वैज्ञानिक बातें नहीं हैं।
मेघ-सम्बन्धी मेघदूत के इन-गिने श्लोकों में इतनी वैज्ञानिक बातों को देखकर हम यह समझते हैं कि कालिदास विज्ञान के अनेक सिद्धान्तों से परिचित थे।
इस लेख में रामदहिन मिश्र जी के लेखों और किताबों से बहुत ज्ञान मिला।
जय हो!


